''एमएसएमई मरने की कगार पर थे, हमारा पैकेज उनके लिए संजीवनी बनेगा''
कोविड महामारी और उसकी वजह से हुए लॉकडाउन के कारण भारत के लाखों छोटे व्यवसायों का भविष्य अंधकारमय है और वे खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं. 20 लाख करोड़ रुपए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राहत पैकेज की पहली खेप में ऐसे कई उपाय हैं जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में 29 प्रतिशत योगदान करने वाले इस क्षेत्र को उबार सकते हैं.
प्रतीकात्मक तस्वीर — डेमो साइट
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनशक्ति हैं. कोविड महामारी और उसकी वजह से हुए लॉकडाउन के कारण भारत के लाखों छोटे व्यवसायों का भविष्य अंधकारमय है और वे खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं. 20 लाख करोड़ रुपए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राहत पैकेज की पहली खेप में ऐसे कई उपाय हैं जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में 29 प्रतिशत योगदान करने वाले इस क्षेत्र को उबार सकते हैं. यहां तक कि सरकार ने 3 लाख करोड़ रुपए के ऋण का हामीदार बनने (अंडरराइटिंग) का भारी जोखिम उठाया है और इस घोषणा पर एक मिश्रित प्रतिक्रिया देखी गई है.
कुछ अर्थशास्त्री इसे माकूल कदम बताते हुए इसका समर्थन कर रहे हैं तो कई एमएसएमई निकायों का मानना है कि ये उपाय उनकी तत्काल चिंताओं को दूर करने में असमर्थ होंगे. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा और डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज ने केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के साथ विस्तृत चर्चा में यह समझने की कोशिश की कि जो कदम उठाए गए हैं, वे इस क्षेत्र को जीवित रखने वाले हैं या फिर वे पुनरुद्धार का मार्ग भी तैयार कर पाएंगे. बातचीत के कुछ अंश:
यह एमएसएमई को ताकतवर खुराक देगा. संपार्शिवक-मुक्त (कोलेटरल फ्री) ऋण से 45 लाख उद्योगों को लाभ हो सकता है. जहां तक संकट के बिंदुओं की बात है तो बैंक कार्यशील पूंजी के संकट से जूझ रहे थे; वेतन या टर्म लोन की किस्तों के लिए पैसा नहीं था. सबसे बड़ी समस्या यह थी कि एमएसएमई जिन उद्योगों और सीपीएसई (केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम) आपूर्ति कर रहे थे, उन्होंने सामूहिक रूप से 5 लाख करोड़ रुपए का बकाया कर दिया. एमएसएमई मरने वाले थे. यह पहली बार है जब एमएसएमई को अगले 45 दिनों में पैसे का भुगतान किया जाएगा. इससे तरलता बहुत बढ़ेगी.
एमएसएमई को ऋण देने में बैंक जोखिम नहीं उठाते हैं. यदि वे एक लाख करोड़ देते हैं, तो हम (सरकार) 1,500 करोड़ रुपए का बीमा प्रीमियम देते हैं. बैंक कर्ज की रकम का 25 फीसद ही देते हैं. शेष 75 फीसदी को हम कवर करते हैं. बैंक अपने जोखिम पर एमएसएमई को ऋण नहीं देते हैं; उन्हें इस (कोलेटरल फ्री क्रेडिट योजना) का लाभ ही होने वाला है. पहले केवल राष्ट्रीयकृत बैंक ही ये ऋण दे सकते थे, अब एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां), जिला सहकारी बैंक, शहरी सहकारी बैंक, सभी को उधार देने के लिए अधिकृत किया गया है. ऋण की उपलब्धता बढ़ गई है. इससे उद्योग को फायदा होगा.
नहीं, हमारे पास नौकरियों के नुक्सान की जानकारी अभी तक नहीं है. आजीविका का नुक्सान नहीं होगा, क्योंकि हमने एनएचएआइ (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) पर काम शुरू कर दिया है, इसलिए लोगों को वहां से काम मिलेगा. बड़ी समस्या यह है कि जब वे काम ही नहीं कर रहे हैं तो श्रमिकों का भुगतान कैसे करेंगे. ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) के मोर्चे पर निर्णय जिसमें अगले तीन महीनों के लिए सभी प्रतिष्ठानों के लिए ईपीएफ में योगदान को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करना शामिल है, सरकार अगले तीन महीनों तक ईपीएफ के लिए 24 प्रतिशत प्रदान करने वाली योजना के अतिरिक्त है. सरकार ने इस लाभ के लिए 15,000 रु. के मासिक वेतन और फर्म में 100 से कम कर्मचारी होने जैसी पुरानी आवश्यकताओं को खत्म कर दिया है. इससे 6,50,000 संगठनों और 4.3 करोड़ कर्मचारियों को मदद मिलेगी. इससे श्रम को लाभ होगा, राहत उन्हें वेतन के रूप में दी जाएगी.
पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले बहुत से प्रवासी श्रमिक अपने घरों से बहुत दूर के इलाकों में कामकाज के लिए इच्छा से नहीं जाते बल्कि मजबूरी में जाते हैं, क्योंकि उनके राज्यों में अवसर ही उपलब्ध नहीं हैं. लोग डर के कारण भागने लगे. लोगों को ऐसा लगा कि वे भूख से मर जाएंगे. मुझे लगता है, जब हालात बेहतर हो जाएंगे तो वे लौटेंगे क्योंकि उनके पास वहां अवसर नहीं हैं. हमें कोरोना के साथ जीने की कला सीखनी होगी—हाथ धोना, एक मीटर की दूरी बनाए रखना अब जिंदगी में शामिल होगा. हमें इसे कारखानों में लागू करना होगा. हमें नए स्वच्छता दिशानिर्देशों का पालन करना होगा. यह कृत्रिम वायरस है जिसे प्रयोगशाला में तैयार किया गया है. अगर इसका टीका खोज लिया जाए, तो फिर हर कोई मुक्त हो जाएगा. लेकिन उद्योग, श्रमिक, ग्राहक सबको कोरोना के साथ जीना सीखना होगा.
अब कोई कॉन्फ्रेंस या मीटिंग ऐसी नहीं होने जा रही जिसमें लोग पास-पास बैठे हों. दुकानों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना होगा और छोटे उद्योगों को भी इसके लिए प्रयास करना होगा.
परिभाषा में बदलाव का फैसला एक ऐतिहासिक कदम है जो 14 साल से लंबित था. सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग—और सेवा आधारित एमएसएमई के बीच अंतर खत्म कर दिया है. टर्नओवर एक और उपाय है जिसे एमएसएमई को परिभाषित करने के लिए जोड़ा गया है. अब तक एमएसएमई को उनके निवेश के पैमाने पर परिभाषित किया जाता था. अब, बहुत सारे उद्योग लाभ उठाने में सक्षम होंगे.
ग्लोबल टेंडर दिया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी उसके लिए आगे आती हैं लेकिन अब यह व्यवसाय केवल एमएसएमई के हाथ में जाएगा. इससे उन्हें कारोबार बढ़ाने के अवसर मिलेंगे.
हम कौशल, इंजीनियरिंग या क्षमता के मामले में किसी से कम नहीं हैं. लोग (व्यवसाय) चीन से बाहर जा रहे हैं, यह भारतीय एमएसएमई के लिए विदेशी निवेश प्राप्त करने और अपनी स्वयं की तकनीक में सुधार करने का एक अवसर है. उनके ईपीएफओ अंशदान में रियायत दी गई है, इससे वेतन देने और अन्य जरूरी खर्चों के लिए पैसे उपलब्ध होंगे.
हम दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहे हैं, एक कोरोना के खिलाफ और दूसरी अर्थव्यवस्था को बचाने की. एमएसएमई को दोहरा लाभ मिलेगा. ये उपाय जीवित रहने के लिए आवश्यक हैं. कोरोना से पहले भी कुछ मुद्दे थे, और ये उपाय भारत को अर्थव्यवस्था की महाशक्ति बना देंगे. आपको छह महीने में फर्क दिखेगा.
यह एक ऐतिहासिक पैकेज है. हर किसी को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है—राज्य सरकारों के पास वेतन देने के लिए पैसा नहीं है, केंद्र सरकार का राजस्व गिर रहा है, श्रम का भुगतान नहीं हो रहा है. पैकेज में पीएम मोदी ने भारत जैसे विकासशील देश के लिए जितना संभव है, उससे कहीं अधिक दिया है. जितना अमीर और अधिक शक्तिशाली देशों ने दिया है, हमने उससे कहीं अधिक दिया है. यह पैकेज हमें कोरोना संकट से उबार ले जाएगा.